3 साल की मासूम से रेप फिर हत्या: दरिंदे को मिली फांसी की सजा, कोर्ट ने कहा- घटना निर्भया केस की याद दिलाती है
By Ashish Meena
जनवरी 16, 2026
फांसी की सजा : मानवता को शर्मसार करने वाले शहडोल के मासूम हत्याकांड में न्याय की जीत हुई है। बुढ़ार स्थित विशेष पॉक्सो (POCSO) कोर्ट ने तीन साल की मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म और उसकी नृशंस हत्या के मामले में मुख्य आरोपी भानू उर्फ रामनारायण ढीमर को दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई है।
अदालत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” (विरलतम से विरल) मामला माना। विशेष न्यायाधीश सुशील कुमार अग्रवाल ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए आरोपी की पत्नी और उसके दोस्त को भी साक्ष्य छिपाने के जुर्म में चार-चार साल की जेल की सजा सुनाई है।
निर्भया केस से तुलना- जज की तल्ख टिप्पणी
फैसला सुनाते समय जज सुशील कुमार अग्रवाल भावुक दिखे। उन्होंने अपनी टिप्पणी में कहा, “यह घटना दिल्ली के निर्भया कांड की याद दिलाती है। 3 साल की उस मासूम बच्ची का दर्द अकल्पनीय रहा होगा, जिसके जननांग भी ठीक से विकसित नहीं हुए थे। ऐसे अपराधियों को सभ्य समाज में रहने का कोई अधिकार नहीं है।”
क्या था पूरा मामला?
यह खौफनाक वारदात 1 मार्च 2023 की रात खैरहा थाना क्षेत्र में हुई थी।
हैवानियत की रात
पीड़िता की मां मोहल्ले में एक शादी समारोह में गई थी। घर पर उसका पति और पति का दोस्त भानू मौजूद था।
साजिश और धमकी
जब मां वापस लौटी तो मासूम बेटी लहूलुहान और बेहोश हालत में जमीन पर पड़ी थी। आरोपी ने पहले इसे “बिस्तर से गिरना” बताया और फिर पूरे परिवार को जान से मारने की धमकी देकर महिला का मुंह बंद करा दिया।
इलाज के दौरान मौत
मासूम ने 7 मार्च 2023 को मेडिकल कॉलेज शहडोल में दम तोड़ दिया।
फॉरेंसिक रिपोर्ट और DNA ने खोला राज
इस केस में मेडिकल कॉलेज के फॉरेंसिक एक्सपर्ट प्रोफेसर पवन वानखेड़े की गवाही सबसे अहम साबित हुई। बचाव पक्ष ने दलील दी कि चोट किसी वस्तु से लगी होगी, लेकिन प्रोफेसर वानखेड़े ने वैज्ञानिक साक्ष्यों के साथ साबित किया कि बच्ची के साथ कुकृत्य हुआ था। पुलिस द्वारा कराए गए DNA परीक्षण ने आरोपी की मौजूदगी और संलिप्तता पर मुहर लगा दी।
धार्मिक और सामाजिक संदेश
शहडोल कोर्ट का यह फैसला समाज में एक कड़ा संदेश देता है कि मासूमों के साथ दरिंदगी करने वालों के लिए कानून में कोई जगह नहीं है। अभियोजन पक्ष ने पैरवी करते हुए कहा कि ऐसे फैसलों से न्याय प्रणाली पर जनता का विश्वास और गहरा होता है।
न्याय मिलने में भले ही समय लगा, लेकिन शहडोल कोर्ट ने यह साबित कर दिया कि दरिंदगी की कोई भी मन्नत या बहाना कानून की नजर में माफी के योग्य नहीं है। यह केस न केवल मध्य प्रदेश बल्कि देश के न्यायिक इतिहास में मिसाल बनेगा।
