ईरान से भिड़ना अमेरिका को पड़ा भारी! सिर्फ 3 हफ्ते में ₹26000 करोड़ राख, पेंटागन में मची खलबली

By Ashish Meena
मार्च 30, 2026

युद्ध कितने विनाशकारी हो सकते हैं, इसका सबसे ताजा उदाहरण ईरान और अमेरिका और इजराइल के बीच जारी सीधा टकराव है. महज तीन हफ्ते, यानी 21 दिनों के भीतर ही दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य महाशक्ति अमेरिका को ऐसा आर्थिक घाटा हुआ है, जिसने उसके अजेय होने के कई मिथक तोड़ दिए हैं.

द वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी सैन्य संपत्तियों को अब तक करीब 1.4 से 2.9 अरब डॉलर (लगभग 12,600 से 26,100 करोड़ रुपये) का भारी-भरकम नुकसान हो चुका है. ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन हमलों ने पश्चिम एशिया में फैले अमेरिकी ठिकानों को जिस सटीकता से निशाना बनाया है, उससे स्पष्ट है कि यह जंग केवल वर्चस्व की नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्थाओं की कमर तोड़ने की भी है. रिपोर्ट के अनुसार, इस तबाही को देखते हुए पेंटागन अब व्हाइट हाउस से 200 अरब डॉलर के अतिरिक्त बजट की मांग करने जा रहा है.

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करोड़ों के फाइटर जेट्स खाक

इस भीषण संघर्ष में अमेरिका को सबसे गहरा जख्म उसके सबसे उन्नत लड़ाकू विमानों के नुकसान के रूप में मिला है. युद्ध के मैदान में अक्सर छोटी सी चूक भारी पड़ती है. ऐसा ही कुछ मार्च की शुरुआत में हुआ, जब सहयोगी देश कुवैत के F/A-18 विमान ने भारी भ्रम के चलते अमेरिका के ही तीन ‘F-15E स्ट्राइक ईगल’ जेट्स को मार गिराया.

राहत की बात यह रही कि सभी छह क्रू सदस्य सुरक्षित बाहर निकल आए, लेकिन करीब 100 मिलियन डॉलर प्रति विमान की कीमत के हिसाब से यह एक बड़ा आर्थिक डेंट था. स्थिति तब और गंभीर हो गई जब 19 मार्च को 82.5 मिलियन डॉलर की कीमत वाले अत्याधुनिक F-35A लाइटनिंग II विमान को आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी. ईरान ने खुले तौर पर दावा किया है कि यह उसके अचूक हमले का नतीजा था.

टैंकर, ड्रोन फ्लीट की भयंकर तबाही

लड़ाकू विमानों को आसमान में ही ईंधन मुहैया कराने वाले टैंकर किसी भी हवाई युद्ध की रीढ़ होते हैं. लेकिन, अमेरिका की यह क्षमता इस बार बुरी तरह प्रभावित हुई है. इराक के हवाई क्षेत्र में एक KC-135 स्ट्रैटोटैंकर की हवा में हुई जोरदार टक्कर ने छह अमेरिकी सैनिकों की जान ले ली.

वहीं, सऊदी अरब के ‘प्रिंस सुल्तान एयर बेस’ पर हुए मिसाइल हमलों ने पांच अन्य KC-135 विमानों को गंभीर नुकसान पहुंचाया. चूंकि इन पुराने विमानों का उत्पादन अब बंद हो चुका है, इसलिए अमेरिका को अब 165 मिलियन डॉलर वाले नए ‘KC-46 पेगासस’ विमानों का रुख करना पड़ेगा. इसके अतिरिक्त, अमेरिकी खुफिया निगरानी की आंख माने जाने वाले एक दर्जन से अधिक MQ-9 रीपर ड्रोन भी नष्ट हो चुके हैं. 16 से 30 मिलियन डॉलर प्रति यूनिट की लागत वाले इन ड्रोन्स को या तो ईरानी मिसाइलों ने हवा में ही राख कर दिया या वे जमीन पर खड़े-खड़े ही खाक हो गए.

अमेरिका के नौसेना को भारी चोट

हमलों का दायरा केवल विमानों तक सीमित नहीं रहा. अमेरिका के अभेद्य माने जाने वाले रक्षा और निगरानी तंत्र में भी गहरी सेंध लगी है. जॉर्डन में तैनात ‘THAAD’ मिसाइल डिफेंस सिस्टम का सबसे अहम हिस्सा, AN/TPY-2 रडार (कीमत लगभग 300 मिलियन डॉलर), एक हमले में बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ है. इससे भी बड़ा झटका कतर के अल-उदीद एयर बेस पर लगा, जहां 1 अरब डॉलर की भारी-भरकम लागत वाला AN/FPS-132 रडार सिस्टम नुकसान का शिकार हुआ.

दूसरी ओर, समंदर में भी अमेरिका के लिए मुश्किलें कम नहीं हैं. 12 मार्च को अमेरिकी नौसेना के गौरव कहे जाने वाले ‘USS Gerald R. Ford’ एयरक्राफ्ट कैरियर पर अचानक आग भड़क उठी. जहाज के कई हिस्सों को हुए भारी नुकसान के बाद अब उसे ग्रीस के एक बंदरगाह पर मरम्मत के लिए खड़ा करना पड़ा है. यह पूरी तबाही तब सामने आई है, जब दोनों देशों के बीच पूर्ण पैमाने पर जमीनी युद्ध अभी शुरू भी नहीं हुआ है. सिर्फ कुछ हफ्तों के हवाई हमलों और ऑपरेशनल घटनाओं ने दुनिया की सबसे मजबूत सेना के बजट को हिला कर रख दिया है.

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आशीष मीणा हिंदी पत्रकार हैं और राष्ट्रीय तथा सामाजिक मुद्दों पर लिखते हैं। उन्होंने पत्रकारिता की पढ़ाई की है और वह तथ्यात्मक व निष्पक्ष रिपोर्टिंग पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

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