MP में 6.40 करोड़ की चमचमाती बिल्डिंग बनी खंडहर! दो साल में खुली ‘निर्माण’ की पोल

By Ashish Meena
फ़रवरी 27, 2026

दो साल पहले बड़े उत्साह के साथ जिस नई आईटीआई बिल्डिंग का उद्घाटन हुआ था, आज वही इमारत चिंता का कारण बन गई है। करोड़ों रुपये की लागत से बने इस सरकारी भवन से उम्मीद थी कि यहां बैठकर बच्चे हुनर सीखेंगे, रोजगार की राह पकड़ेंगे और अपने परिवार का भविष्य संवारेंगे। लेकिन हकीकत कुछ और ही कहानी कह रही है।

MP के नरसिंहपुर जिले के तेंदूखेड़ा में बनी इस आईटीआई बिल्डिंग की हालत महज दो साल में जर्जर हो गई है। दीवारों में दरारें दिख रही हैं, टाइल्स उखड़ रही हैं और पीने के पानी की भी ठीक व्यवस्था नहीं है। सवाल उठ रहा है, जब निर्माण पर 6 करोड़ 40 लाख रुपये खर्च हुए, तो भवन इतनी जल्दी खराब कैसे हो गया?

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6.40 करोड़ की लागत, दो साल में बदहाल

मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के तेंदूखेड़ा में यह आईटीआई भवन करीब दो साल पहले तैयार हुआ था। कुल लागत 6 करोड़ 40 लाख रुपये बताई गई थी। इस सरकारी आईटीआई भवन का मकसद था कि यहां तकनीकी शिक्षा के तहत युवाओं को प्रशिक्षण दिया जाए।

लेकिन मौजूदा हालात देखकर लगता है कि निर्माण में कहीं न कहीं बड़ी लापरवाही हुई है। भवन की दीवारों में जगह-जगह दरारें साफ दिखाई देती हैं। फर्श की टाइल्स उखड़ रही हैं। कुछ कमरों की छत से प्लास्टर झड़ने की शिकायत भी सामने आई है।

इतनी बड़ी लागत के बावजूद अगर सरकारी आईटीआई भवन दो साल में जर्जर हो जाए, तो स्वाभाविक है कि लोग भ्रष्टाचार और घटिया निर्माण सामग्री पर सवाल उठाएं।

शिक्षक और छात्र परेशान, पढ़ाई पर असर

इस आईटीआई भवन में पढ़ने वाले छात्र भी परेशान हैं। उनका कहना है कि जब बारिश होती है, तो कुछ कमरों में नमी और पानी टपकने जैसी समस्या सामने आती है। कई जगह दीवारों की हालत देखकर डर लगता है।

एक छात्र ने बताया कि वे यहां तकनीकी कोर्स सीखने आए हैं, लेकिन भवन की हालत देखकर चिंता होती है। अगर समय रहते मरम्मत नहीं हुई, तो पढ़ाई प्रभावित हो सकती है।

भवन में कार्यरत प्राचार्य भी कई बार अधिकारियों के पास आवेदन देकर मरम्मत की मांग कर चुके हैं। उन्होंने संबंधित विभाग को लिखित में जानकारी दी है कि सरकारी आईटीआई भवन की स्थिति खराब हो रही है और तत्काल सुधार की जरूरत है।

पीने के पानी तक की व्यवस्था नहीं

सबसे हैरानी की बात यह है कि 6.40 करोड़ की लागत से बने इस आईटीआई भवन में पीने के पानी की भी पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। छात्रों को पानी के लिए अलग से इंतजाम करना पड़ता है।

जब किसी संस्थान को युवाओं के कौशल विकास के लिए बनाया जाता है, तो वहां बुनियादी सुविधाएं जैसे पानी, शौचालय, सुरक्षित कक्ष और साफ परिसर होना जरूरी है। लेकिन यहां हालात इसके उलट दिखाई दे रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि इतनी बड़ी लागत के बावजूद अगर सुविधाएं अधूरी हैं, तो निर्माण की गुणवत्ता और निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

सरकारी निर्माण पर उठे भ्रष्टाचार के सवाल

जब करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद सरकारी भवन दो साल में जर्जर हो जाए, तो लोग स्वाभाविक रूप से पूछते हैं, क्या निर्माण में भ्रष्टाचार हुआ? क्या घटिया सामग्री का उपयोग किया गया?

हालांकि अधिकारी इस मामले में खुलकर कुछ कहने से बचते नजर आए। लेकिन स्थानीय स्तर पर चर्चा यही है कि निर्माण कार्य की सही जांच होनी चाहिए।विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी निर्माण कार्यों में गुणवत्ता की नियमित जांच और समय-समय पर ऑडिट जरूरी है। अगर शुरुआत में ही कमियां पकड़ ली जाएं, तो बाद में ऐसी स्थिति नहीं बनती।

युवाओं के भविष्य से जुड़ा मामला

यह मामला सिर्फ एक इमारत का नहीं है, बल्कि युवाओं के भविष्य से जुड़ा है। आईटीआई संस्थान का उद्देश्य होता है कि यहां से निकलने वाले छात्र तकनीकी कौशल सीखकर रोजगार पा सकें। अगर भवन ही असुरक्षित या जर्जर होगा, तो पढ़ाई का माहौल भी प्रभावित होगा। छात्रों का मनोबल गिर सकता है। ऐसे में जरूरी है कि संबंधित विभाग इस मुद्दे को गंभीरता से ले।

क्या कहती है प्रशासनिक जिम्मेदारी?

सरकारी भवनों के निर्माण में कई स्तरों पर मंजूरी और निगरानी होती है। टेंडर प्रक्रिया से लेकर निर्माण और निरीक्षण तक कई अधिकारी जिम्मेदार होते हैं। यदि दो साल में ही भवन की हालत खराब हो रही है, तो यह सिर्फ ठेकेदार की नहीं, बल्कि निगरानी व्यवस्था की भी जिम्मेदारी बनती है। स्थानीय नागरिकों की मांग है कि इस आईटीआई भवन की तकनीकी जांच कराई जाए और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई हो।

 

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आशीष मीणा हिंदी पत्रकार हैं और राष्ट्रीय तथा सामाजिक मुद्दों पर लिखते हैं। उन्होंने पत्रकारिता की पढ़ाई की है और वह तथ्यात्मक व निष्पक्ष रिपोर्टिंग पर ध्यान केंद्रित करते हैं।