कोयला खदानों में मजदूरों का शोषण? सैलरी आते ही 60% कमीशन ले रहा ठेकेदार
By Ashish Meena
मार्च 11, 2026
मध्य प्रदेश के बैतूल जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने कोयला खदानों में काम करने वाले मजदूरों की स्थिति को फिर से चर्चा में ला दिया है। पाथाखेड़ा क्षेत्र की कोयला खदानों में काम कर रहे ठेका मजदूरों ने आरोप लगाया है कि उन्हें महीनों से आर्थिक शोषण का सामना करना पड़ रहा है। मजदूरों का कहना है कि उनकी सैलरी खाते में आने के बाद भी उन्हें उसका पूरा लाभ नहीं मिलता।
करीब 300 मजदूर पिछले दस दिनों से अपने बकाया वेतन और आर्थिक शोषण के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। परेशान मजदूरों ने मंगलवार को जिला कलेक्टर से मिलकर शिकायत दर्ज कराई और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। मजदूरों का आरोप है कि ठेकेदार उनके वेतन का बड़ा हिस्सा कमीशन के नाम पर वापस ले लेता है।
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कोयला खदानों में मजदूरों का आर्थिक शोषण
बैतूल जिले के पाथाखेड़ा क्षेत्र में कोयला खदानों में काम करने वाले मजदूरों ने ठेकेदार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। मजदूरों का कहना है कि उनकी तय तनख्वाह का बड़ा हिस्सा उन्हें नहीं मिलता।
मजदूरों के अनुसार उनकी सैलरी लगभग 34 हजार रुपये निर्धारित है, लेकिन उन्हें हाथ में केवल करीब 12 हजार रुपये ही दिए जाते हैं। बाकी पैसा ठेकेदार अपने पास रख लेता है।
मजदूरों का आरोप है कि ठेकेदार सैलरी का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा वापस ले लेता है। इस तरह हर महीने लाखों रुपये का पैसा मजदूरों की जेब में जाने के बजाय ठेकेदार के पास चला जाता है।
एटीएम कार्ड भी ठेकेदार के पास
मजदूरों ने यह भी बताया कि उनके बैंक खातों के एटीएम कार्ड भी ठेकेदार के पास ही रहते हैं। जैसे ही उनके खाते में वेतन आता है, ठेकेदार एटीएम के जरिए पैसे निकलवा लेता है।
इसके बाद मजदूरों को केवल थोड़ी राशि ही दी जाती है। मजदूरों का कहना है कि इस व्यवस्था का विरोध करने पर उन्हें धमकियां दी जाती हैं। कुछ मजदूरों ने आरोप लगाया कि जब उन्होंने पैसे वापस देने से इनकार किया तो उन्हें पिछले तीन महीनों से वेतन ही नहीं दिया गया।
कोल माइंस प्रोविडेंट फंड में भी गड़बड़ी के आरोप
मजदूरों ने कोल माइंस प्रोविडेंट फंड यानी CMPF में भी अनियमितताओं का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि कई मजदूरों के फंड का हिसाब साफ नहीं है। करीब 20 से 25 मजदूर ऐसे हैं जिन्हें छह महीने से भी ज्यादा समय से फंड का भुगतान नहीं मिला है। कुछ मजदूरों के लाखों रुपये के फंड का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं दिया जा रहा है। इस वजह से मजदूरों को शक है कि उनके फंड की राशि का भी गलत इस्तेमाल किया जा रहा है।
मजदूरों ने कलेक्टर से लगाई गुहार
आर्थिक शोषण और बकाया वेतन से परेशान मजदूरों ने जिला कलेक्टर से मिलकर शिकायत दर्ज कराई है। मजदूरों ने मांग की है कि पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए।
उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें उनका बकाया वेतन जल्द दिलाया जाए और दोषी ठेकेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। मजदूरों का कहना है कि वे कई दिनों से अपनी समस्या को लेकर आवाज उठा रहे हैं लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं हुआ है।
जांच के लिए टीम गठित
मजदूरों की शिकायत मिलने के बाद जिला प्रशासन ने इस मामले को गंभीरता से लिया है। कलेक्टर ने श्रम अधिकारी के नेतृत्व में एक जांच टीम गठित कर दी है।यह टीम पूरे मामले की जांच करेगी और यह पता लगाएगी कि मजदूरों के आरोपों में कितनी सच्चाई है। प्रशासन का कहना है कि अगर जांच में किसी भी तरह की गड़बड़ी सामने आती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
मजदूरों की जिंदगी पर असर
कोयला खदानों में काम करने वाले मजदूरों का जीवन पहले से ही काफी कठिन होता है। कठिन परिस्थितियों में काम करने के बावजूद अगर उन्हें पूरा वेतन नहीं मिलता तो उनकी आर्थिक स्थिति और खराब हो जाती है।
मजदूरों का कहना है कि उनके परिवार का पूरा खर्च इसी वेतन पर निर्भर करता है। अगर उन्हें उनका पूरा पैसा नहीं मिलता तो बच्चों की पढ़ाई और घर का खर्च चलाना मुश्किल हो जाता है। इस वजह से मजदूरों में काफी नाराजगी देखी जा रही है।
श्रम कानूनों का पालन जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि मजदूरों के साथ इस तरह का व्यवहार श्रम कानूनों के खिलाफ है। मजदूरों को उनकी पूरी मजदूरी मिलना उनका अधिकार है। अगर किसी ठेकेदार द्वारा मजदूरों की सैलरी में कटौती की जाती है या उनका पैसा रोका जाता है तो यह गंभीर अपराध माना जा सकता है। इस तरह के मामलों में प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह तुरंत कार्रवाई करे और मजदूरों को न्याय दिलाए।
