महंगा सौदा…एक लीटर एथेनॉल बनाने में 10,000 लीटर पानी खर्च, क्या पेट्रोल बचाने के चक्कर में रहना पड़ेगा प्यासा?

By Ashish Meena
मई 1, 2026

नई दिल्ली। भारत में पेट्रोल की निर्भरता कम करने के लिए बढ़ावा दी जा रही एथेनॉल ब्लेंडिंग नीति भविष्य में देश को प्यासा कर सकती है। विशेषज्ञों और सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, एथेनॉल का उत्पादन पानी के भारी दोहन पर टिका है। चौंकाने वाली बात यह है कि चावल से मात्र 1 लीटर एथेनॉल बनाने में लगभग 10,790 लीटर पानी खर्च हो रहा है।

खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा के अनुसार, 1 किलो चावल उगाने में 3 से 5 हजार लीटर पानी लगता है और करीब 3 किलो चावल से सिर्फ 1 लीटर एथेनॉल तैयार होता है। सरकार ने साल 2025-26 के लिए चावल का कोटा 52 लाख टन से बढ़ाकर 90 लाख टन करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए गरीबों के राशन में मिलने वाले चावल की कटौती कर उसे डिस्टिलरीज को भेजने की योजना है।

मक्का से 4,670 लीटर और गन्ने से 3,630 लीटर पानी प्रति लीटर एथेनॉल पर खर्च हो रहा है। एथेनॉल मिलों से निकलने वाला गंदा पानी (विनेस) जमीन और भूजल को जहरीला बना सकता है। यूपी और कर्नाटक जैसे राज्यों में एथेनॉल प्लांट तेजी से भूजल सोख रहे हैं, जिससे जल स्तर गिरने का खतरा पैदा हो गया है। IPCC लेखक अंजल प्रकाश ने चेतावनी दी है कि खेती पर निर्भर भारत जैसे देश के लिए एथेनॉल ब्लेंडिंग जल संकट को और गंभीर बना सकती है। सवाल यह है कि क्या पेट्रोल बचाने की कीमत पीने के पानी से चुकाई जाएगी?

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Ethanol बनाने में लगता है हजारों लीटर पानी

एथेनॉल ब्लेंडिंग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें चावल आदि से निकला अल्कोहल पेट्रोल में मिला दिया जाता है. फूड सेक्रेटरी संजीव चोपड़ा के अनुसार, चावल से एक लीटर एथेनॉल बनाने में लगभग 10,790 लीटर पानी लगता है. इसमें खेती के दौरान सिंचाई में इस्तेमाल होने वाला पानी भी शामिल है. इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक संजीव चोपड़ा ने 2024 में दिल्ली में हुई एक ग्लोबल कॉन्फ्रेंस में यह डेटा शेयर किया था.

उनके मुताबिक चावल से बनने वाले एथेनॉल में इस्तेमाल होने वाला अधिकतर पानी प्रोसेसिंग से नहीं, बल्कि खेती से आता है. 1 किलो चावल उगाने में लगभग 3 हजार से 5 हजार लीटर पानी लगता है. और लगभग ढाई से 3 किलो चावल से एक लीटर एथेनॉल बनता है, जिससे कुल खपत लगभग 10,000 लीटर से ज्यादा हो जाती है. इसकी तुलना में, मक्का से एक लीटर एथेनॉल बनाने में लगभग 4,670 लीटर और गन्ने से लगभग 3,630 लीटर पानी लग जाता है.

ऐथनॉल पर बड़ी निर्भरता बढ़ा सकती है जल संकट?

एक समस्या और भी है कि जितना पानी एथेनॉल बनाने में लग रहा है, उसकी तुलना में तैयार होने वाला प्रोडक्ट बहुत कम है. एक किलोग्राम चावल उगाने में लगभग 3,000 लीटर पानी लग जाता है. एक टन चावल से सिर्फ 470 लीटर एथेनॉल ही बना पाता है. एथेनॉल बनाने के लिए चावल और गन्ने का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है. इन दोनों ही फसलों को उगाने में पानी की खपत काफी ज्यादा होती है. वहीं एथेनॉल मिलों से बड़ी मात्रा में गंदा पानी (विनेस) भी निकलता है. अगर इस पानी को ठीक से ट्रीट न किया जाए, तो यह जमीन के ऊपर और जमीन के नीचे जल प्रदूषण का कारण बन सकती है.

इस बीच, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में मौजूद एथेनॉल प्लांट जमीन के नीचे के पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं. इतने बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की वजह से ग्राउंडवाटर के लेवल को भी खतरा है. हालांकि भारत में एथेनॉल ब्लेंडिंग में चावल का इस्तेमाल अभी शुरुआती स्टेज में है, लेकिन मुख्य रूप से गन्ने के इस्तेमाल पर निर्भर है. पर गन्ना भी पानी की बहुत खपत करता है. गन्ने से एक लीटर एथेनॉल बनाने के लिए लगभग 3600 लीटर पानी की खपत होती है. ऐसे में एथेनॉल किसी भी तरह से 100 प्रतिशत किफयती तो बिल्कुल नहीं है.

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आशीष मीणा हिंदी पत्रकार हैं और राष्ट्रीय तथा सामाजिक मुद्दों पर लिखते हैं। उन्होंने पत्रकारिता की पढ़ाई की है और वह तथ्यात्मक व निष्पक्ष रिपोर्टिंग पर ध्यान केंद्रित करते हैं।