पश्चिम बंगाल में पहली बार बनने जा रही भाजपा की सरकार, आखिर कहां चूक गईं ममता बनर्जी? 15 साल बाद सत्ता से बाहर हो रही TMC
By Ashish Meena
मई 4, 2026
आज पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे जारी किये जा रहे है। रुझानों में पश्चिम बंगाल और असम में बीजेपी को शानदार जीत मिलती दिख रही है। रुझानों में भाजपा के इस शानदार प्रदर्शन को देखते हुए पार्टी ने दिल्ली स्थित मुख्यालय में जश्न की तैयारियां पूरी कर ली हैं। आज शाम 6:30 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा मुख्यालय जाएंगे। चुनावी नतीजों के बाद पीएम मोदी न केवल जीत का जश्न मनाएंगे, बल्कि कार्यकर्ताओं को संबोधित भी करेंगे।
बंगाल के रुझानों में बीजपी 169 सीटों पर आगे
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए जारी मतगणना से प्राप्त रुझानों के अनुसार, बीजपी 169 सीट पर आगे है, जबकि टीएमसी 91 सीट पर बढ़त बनाए हुए है। यह रुझान राज्य के राजनीतिक परिदृश्य को बदल सकने वाले संभावित नतीजे की ओर संकेत देता है। शुरुआती आंकड़े भौगोलिक रूप से बंटे जनादेश के संकेत दे रहे हैं। भाजपा सीमावर्ती, आदिवासी और औद्योगिक क्षेत्रों में आगे बढ़ती दिख रही है, जबकि तृणमूल कोलकाता के कुछ हिस्सों और कुछ ग्रामीण गढ़ों में अपनी पकड़ बनाए हुए है।
इस चुनाव को ममता बनर्जी के लगातार चौथी बार सत्ता में आने के प्रयास की बड़ी परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है। वहीं, आक्रामक प्रचार अभियान चलाने वाली भाजपा 2021 में मिली बढ़त को निर्णायक सफलता में बदलने की कोशिश कर रही है। भवानीपुर सीट पर कांटे की टक्कर नजर आ रही है। मुख्यमंत्री एवं तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी मतगणना के दूसरे दौर के बाद दक्षिण कोलकाता की इस चर्चित सीट पर भाजपा के उम्मीदवार शुभेंदु अधिकारी से पीछे थीं, लेकिन तीसरे दौर में वह 8,482 मतों से आगे हैं। भवानीपुर का मुकाबला प्रतिष्ठा की लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है।
1. कानून व्यवस्था के मुद्दे पर नाकामी
राज्य में कानून-व्यवस्था लंबे समय से एक बड़ा चुनावी मुद्दा रहा। विपक्ष ने लगातार आरोप लगाया कि कई इलाकों में हिंसा, राजनीतिक झड़पें और अपराध की घटनाएं बढ़ी हैं। आरजी कर मेडिकल कॉलेज में ‘रेप और मर्डर’ की घटना के बाद लोगों के सब्र का बांध टूट गया। आम लोगों के बीच लगातार सुरक्षा को लेकर चिंता देखने को मिली। बीजेपी ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया और राज्य प्रशासन पर भेदभाव करने के आरोप लगाए। चुनावी हिंसा और स्थानीय स्तर पर बढ़ते तनाव ने भी कई इलाकों में मतदाताओं को प्रभावित किया और ममता सरकार लोगों में कानून व्यवस्था को लेकर भरोसा जगा पाने में नाकाम रही।
2. भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनता की नाराजगी
भ्रष्टाचार के आरोपों ने भी TMC की छवि को नुकसान पहुंचाया। कई सरकारी योजनाओं और भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर सवाल उठे, जिससे आम जनता में असंतोष बढ़ा। विपक्ष ने इन मुद्दों को चुनावी मंच पर प्रमुखता से उठाया और सरकार को घेरने में कामयाब रही। बीजेपी ने लोगों को यह यकीन दिला दिया कि राज्य सरकार में हो रही भर्तियों से लेकर ठेके-टेंडर तक में पारदर्शिता की कमी है और जिम्मेदार लोगों पर सख्त कार्रवाई नहीं हो रही। अमित शाह ने अपनी चुनावी रैलियों में बार-बार ‘सिंडिकेट राज’ को खत्म करने का जिक्र किया और रुझान बता रहे हैं कि जनता ने इसे हाथों-हाथ लिया।
3. घुसपैठियों के प्रति नरम होने का आरोप
बीजेपी ने तृणमूल कांग्रेस पर हर रैली में आरोप लगाया कि वह घुसपैठ के मुद्दे पर सख्ती नहीं दिखा रही। सीमावर्ती इलाकों में यह मुद्दा काफी प्रभावी रहा। पार्टी ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थानीय संसाधनों से जोड़ा, जिससे लोगों के बीच इस मुद्दे पर चर्चा तेज हो गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह सहित बीजेपी के सभी बड़े नेता जनता यह भरोसा दिलाने में कामयाब रहे कि अगर सूबे में बीजेपी की सरकार बनती है तो घुसपैठियों को राज्य से बाहर ‘फेंक’ दिया जाएगा। वहीं, TMC इस आरोप का प्रभावी जवाब देने में कमजोर नजर आई और जनता पर असर छोड़ने में नाकाम रही।
4. मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोपों की काट न होना
ममता बनर्जी के पिछले 15 साल के शासनकाल के दौरान TMC पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप भी जमकर लगे। बीजेपी लगातार इस मुद्दे को उठाती रही और कहती रही कि सरकार एक वर्ग विशेष को प्राथमिकता दे रही है। यह आरोप संदेशखाली जैसे उन इलाकों में असरदार रहा, जहां अपराधों में लिप्त होने के बावजूद शाहजहां शेख जैसे मुस्लिम अपराधियों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई। बीजेपी के इन आरोपों का मजबूत तरीके से जवाब देने में टीएमसी सफल नहीं रही, जिससे विपक्ष को अपने पक्ष में माहौल बनाने का मौका मिला।
5. 15 साल का एंटी-इन्कंबैंसी फैक्टर
लगातार 15 साल तक सत्ता में रहने के बाद एंटी-इन्कंबैंसी फैक्टर भी तृणमूल कांग्रेस के कमजोर प्रदर्शन का बड़ा कारण बना। लंबे समय तक एक ही सरकार रहने से और तमाम मुद्दों पर कमजोर प्रदर्शन की वजह से लोगों में बदलाव की भावना तेज होने लगी। कई जगहों पर स्थानीय मुद्दों और विकास कार्यों को लेकर भी जमकर असंतोष देखने को मिला। बीजेपी ने इस भावना को खूब भुनाया और खुद को एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश किया। इससे मतदाताओं का झुकाव धीरे-धीरे बदलाव की ओर और अंतत: बीजेपी की ओर बढ़ता गया।
बीजेपी की आक्रामक रणनीति ने किया ‘खेला’
पश्चिम बंगाल के चुनावी रुझानों ने यह साफ कर दिया है कि इस बार मुकाबला पूरी तरह बदल गया है। बीजेपी की आक्रामक रणनीति और TMC के खिलाफ बने माहौल ने बड़ा असर डाला। कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार, घुसपैठ, तुष्टिकरण और एंटी-इन्कंबैंसी जैसे मुद्दों ने मिलकर चुनावी नतीजों की दिशा तय कर दी। हालांकि अंतिम नतीजे अभी थोड़ी दूर हैं, लेकिन रुझानों से यह संकेत जरूर मिल रहा है कि बंगाल की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश करने जा रही है। अब सूबे में बीजेपी की पहली सरकार का बनना करीब-करीब तय हो गया है।
पश्चिम बंगाल की सियासत
पश्चिम बंगाल की सियासत ने फिर करवट ली है. 34 सालों के लेफ्ट के शासन के बाद साल 2011 में बंगाल के लोगों ने ममता बनर्जी की ‘मां, माटी, मानुष’ के नारे पर भरोसा जताया था और राज्य में ममता बनर्जी की सरकार बनी थी, लेकिन 15 सालों के ममता बनर्जी के शासन के बाद अब फिर से बंगाल में पोरिवर्तन (परिवर्तन) की हवा बही है. पश्चिम बंगाल की सियासत में पहली बार बीजेपी ऐतिहासिक जीत की बढ़ रही है, जबकि तृणमूल कांग्रेस के नंबर डबल डिजिट में सिमटते दिख रहा है और बंगाल फतह का बीजेपी का सपना साकार होता दिख रहा है.
जनसंघ के संस्थापक डॉ श्मामाप्रसाद मुखर्जी पर कमल खिलाना बीजेपी का सपना रहा है. दशकों पुराना बीजेपी का सपना साकार हो रहा है. पूर्वी भारत के तीन राज्यों अंग (बिहार), कलिंग (ओडिशा) और बंग (बंगाल) पर अब बीजेपी के शासन का सपना साकार हो रहा है.
90 के दशक में बंगाल विधानसभा में कभी बीजेपी के एक मात्र विधायक बादल भट्टाचार्य थे और दो सांसद तपन सिकदर और सत्यव्रत मुखर्जी थे. एक विधायक और दो सांसदों से अपना सफर शुरू करने वाली भाजपा अब बंगाल में सरकार बनाने की ओर कदम बढ़ा रही है. आइए जानें वे क्या वजह हैं, जिसकी वजह से बीजेपी बंगाल में ऐतिहासिक जीत की बढ़ रही है और ममता बनर्जी को करारा हार का सामना करना पड़ रहा है.
भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और हिंसा पर जनता का प्रहार
ममता बनर्जी ने 2011 में 34 सालों के लेफ्ट शासन को विकास, कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार, रोजगार और हिंसा के मुद्दे पर हराया था और 15 सालों के शासन के बाद अब यही वे मुद्दे जिन्हें आधार बनाकर बीजेपी ने ममता बनर्जी और उनकी पार्टी को घेरा और ममता बनर्जी की पार्टी पराजय का रास्ता दिखाया. बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में परिवर्तन का आह्वान किया था और परिवर्तन यह नारा अब वोट में तब्दील होता दिख रहा है.
सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन की वजह से सत्ता में आयी ममता बनर्जी के 15 सालों के शासन में राज्य उद्योग, रोजगार और निवेश के मामले में पूरी तरह से पिछड़ गया है. बीजेपी ने राज्य में विकास का मुद्दा बनाया और दावा किया कि कभी बंगाल देश के अव्बल राज्यों में था, लेकिन अब यह पिछड़ गया है. बीजेपी ने फिर से बंगाल में विकास का दावा किया है. जिस पर राज्य की जनता ने भरोसा किया.
मुस्लिम और एससी-एसटी वोट में सेंधमारी
परिवर्तन, बंगाल में विकास, रोजगार और कानून-व्यवस्था की स्थिति को बीजेपी ने मुद्दा बनाया था. राज्य की जनता ने बीजेपी के परिवर्तन के नारे पर जनमत दिया है. भ्रष्टाचार, सिंडिकेट राज, परिवारवाद और हिंसा की सियासत ममता बनर्जी पर भारी पड़ा है.
मुस्लिम वोट ममता बनर्जी की सियासत का आधार था, लेकिन मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे जिलों में बीजेपी की बढ़त और हुमायूं कबीर की जीत से साफ है कि मुस्लिम वोट बंटे हैं. उत्तर 24 परगना और दक्षिण 24 परगना जैसे जिले जहां मुस्लिम आबादी बड़ी संख्या में हैं. वहां भी बीजेपी की बढ़त दिखते मिल रही है. 2008 में ममता बनर्जी ने दक्षिण 24 परगना और पूर्व मेदिनीपुर में जिला परिषद में जीत हासिल कर शुरुआत की थी, लेकिन इस चुनाव में ये जिले भी ममता बनर्जी की हाथों से फिसलते दिख रहे हैं.
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के वोट, मतुआ, चाय बागान श्रमिकों के वोट बीजेपी को मिले. उत्तर बंगाल के साथ-साथ बीजेपी ने दक्षिण बंगाल और जंगल महल में भी अपनी बढ़त बनाई है. इससे साफ है कि बीजेपी ने तृणमूल कांग्रेस का गढ़ भेदने में सफल रही है.
महिलाओं ने भी छोड़ा ममता का साथ
परिणाम से रूझानों से साफ है कि पिछले चुनावों में महिलाएं ममता बनर्जी के पक्ष में खुलकर उतरी थीं, लेकिन इस चुनाव में महिलाएं भी तृणमूल कांग्रेस का साथ नहीं देती दिख रही हैं. ममता बनर्जी ने महिलाओं के लिए लक्ष्मी भंडार और स्वास्थ्य साथी जैसी योजना लेकर आई थीं. युवाओं के लिए युवा साथी योजना के तहत 1500 रुपए महीने देने का ऐलान किया था, लेकिन तृणमूल कांग्रेस की तुलना में बीजेपी की योजनाएं बीजेपी को ज्यादा लुभाई. बीजेपी ने महिलाओं को 3000 रुपए देने और बसों में मुफ्त यात्रा का वादा किया था. महिलाओं ने इस वादे पर भरोसा किया.
राजनीतिक विश्वेषक पार्थ मुखोपाध्याय कहते हैं कि भ्रष्टाचार, कानून व्यवस्था, रोजगार, नो इंडस्ट्री, अभिषेक और परिवार तंत्र ममता बनर्जी पर भारी पड़ा. बंगाल में प्रजातांत्रिक व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया गया था. विपक्षी पार्टियों के पास कोई अधिकार नहीं थे. पिछले चुनाव में भाजपा को 77 सीटें मिली थी, लेकिन पांच सालों में तृणणूल कांग्रेस ने करीब 17 विधायकों को तोड़ लिया. यहां तक कांग्रेस के जीते विधायक को भी तृणमूल कांग्रेस ने तोड़ लिया.
ममता पर भारी पड़ा एंटी-इनकंबेंसी
पार्थ मुखोपाध्याय का कहना है कि आरजी कर रेप केस और शिक्षक भर्ती में भ्रष्टाचार ने राज्य की जनता का ममता बनर्जी की सरकार पर भरोसा खत्म कर दिया. मालदा, हुगली, दक्षिण 24 और मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में बीजेपी को वोट मिले हैं. इससे साफ है कि मुस्लिम का एक वर्ग भी अब ममता बनर्जी पर भरोसा नहीं कर रहा है. 15 सालों की ममता बनर्जी की सरकार पर एंटी इनकंबेंसी पूरी तरह से हावी रहा और बीजेपी ने पलने संगठन बनाया और उस संगठन के बल पर ममता बनर्जी को मात देने में सफल रही.
इसके साथ ही मतदाता सूची के SIR में फर्जी मतदाताओं के नाम कटे. इसकी वजह से टीएमसी को मिलने वाले वोटों में कमी आई है. चुनाव आयोग ने चुनाव को लेकर सख्त इंतजाम किए. करीब 700 कंपनी केंद्रीय बल की तैनाती की. बड़ी संख्या में चुनाव पर्यवेक्षक से लेकर पुलिस पर्यवेक्षकों की तैनाती की. ममता बनर्जी के भरोसेमंद अधिकारियों के तबादले किए, जिससे मतदाताओं ने निर्भय होकर मतदान किया, जो बीजेपी के पक्ष में जाती दिख रही है.
