आदिवासी वोटरों को साधने में जुटी मध्यप्रदेश सरकार, चुनावों पर पैनी नजर, पहली किसान कैबिनेट बैठक में मिले संकेत
By Ashish Meena
मार्च 3, 2026
सोमवार को बड़वानी जिले के नागलवाड़ी में प्रदेश की पहली किसान कैबिनेट बैठक हुई। टेंट-तंबू में भीलट देव मंदिर परिसर में आयोजित इस बैठक ने सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी दिया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और मंत्रिमंडल के सदस्य आदिवासी संस्कृति के प्रमुख पर्व भगोरिया में भी शामिल हुए।
इस किसान कैबिनेट को राजनीतिक जानकार आदिवासी वोट बैंक पर सीधा फोकस मान रहे हैं। 2027 के निकाय चुनाव और 2028 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा सरकार ने अभी से रणनीति बनानी शुरू कर दी है। सवाल यही है कि क्या यह कदम आदिवासी इलाकों में भाजपा की पकड़ मजबूत करेगा?
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नागलवाड़ी में किसान कैबिनेट
बड़वानी का नागलवाड़ी जनजातीय बहुल क्षेत्र है। यहां पहली किसान कैबिनेट आयोजित करना अपने आप में एक संकेत माना जा रहा है। बैठक भीलट देव मंदिर परिसर में हुई और मंत्रियों ने भगोरिया उत्सव में भाग लेकर स्थानीय संस्कृति से जुड़ाव दिखाया। इससे यह संदेश देने की कोशिश की गई कि सरकार आदिवासी समाज की परंपराओं और मुद्दों के साथ खड़ी है।
कृषक कल्याण वर्ष 2026 के तहत आयोजित इस किसान कैबिनेट में किसानों की आय बढ़ाने, आत्मनिर्भर बनाने और योजनाओं को जमीन पर उतारने की बात कही गई। लेकिन विपक्ष सवाल उठा रहा है कि आखिर बड़वानी और निमाड़ के किसानों को ठोस तौर पर क्या मिला?
47 एसटी सीटों का गणित और राजनीतिक महत्व
मध्य प्रदेश की 230 विधानसभा सीटों में से 47 सीटें अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित हैं। यह सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि सत्ता की चाबी मानी जाती हैं।2023 के चुनाव में भाजपा ने 24 और कांग्रेस ने 22 सीटों पर जीत दर्ज की। एक सीट भारत आदिवासी पार्टी के खाते में गई।
मालवा-निमाड़ क्षेत्र में आदिवासी राजनीति का सबसे बड़ा प्रभाव है। यहां 22 सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं। 2023 में कांग्रेस ने 11, भाजपा ने 10 और एक सीट भारत आदिवासी पार्टी ने जीती। इन आंकड़ों से साफ है कि आदिवासी वोट बैंक किसी भी पार्टी के लिए निर्णायक साबित हो सकता है।
2013 से 2023 तक: कैसे बदला आदिवासी सीटों का समीकरण
2013 में आरक्षित 47 सीटों में से भाजपा ने 31 सीटें जीती थीं। कांग्रेस को सिर्फ 15 सीटें मिली थीं। 2018 में तस्वीर बदल गई। कांग्रेस ने 30 सीटें जीतकर भाजपा को बड़ा झटका दिया। भाजपा 16 सीटों पर सिमट गई। 2023 में भाजपा ने वापसी करते हुए 24 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस 22 सीटों पर सफल रही।
यह उतार-चढ़ाव दिखाता है कि आदिवासी सीटों पर कोई भी पार्टी स्थायी रूप से मजबूत नहीं है। यही कारण है कि नागलवाड़ी में किसान कैबिनेट को भविष्य की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
22% आबादी और 80 से ज्यादा सीटों पर असर
प्रदेश की कुल आबादी में लगभग 22 प्रतिशत हिस्सा आदिवासी समुदाय का है। हालांकि 47 सीटें आरक्षित हैं, लेकिन यह वर्ग करीब 80 से ज्यादा सीटों पर जीत-हार तय करने की स्थिति में माना जाता है। यानी आदिवासी वोट बैंक सिर्फ आरक्षित सीटों तक सीमित नहीं है, बल्कि कई सामान्य सीटों पर भी असर डालता है।
इसीलिए नागलवाड़ी की किसान कैबिनेट को सिर्फ कृषि बैठक नहीं, बल्कि चुनावी तैयारी का हिस्सा माना जा रहा है।
2027 सेमीफाइनल, 2028 फाइनल
अगले दो साल मोहन सरकार के लिए अहम माने जा रहे हैं। 2027 के निकाय चुनाव को सेमीफाइनल और 2028 के विधानसभा चुनाव को फाइनल माना जा रहा है। भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में कई वादे किए थे, जिनमें लाडली बहना योजना के तहत हर माह 3000 रुपये देने का वादा प्रमुख है। फिलहाल आधी राशि दी जा रही है। अगर सरकार अगले तीन साल में इन वादों को पूरा कर पाती है, तो चुनावी गणित उसके पक्ष में जा सकता है।
किसानों को मिला क्या?
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने सवाल उठाया है कि दो दशक से सत्ता में काबिज भाजपा सरकार ने किसान कैबिनेट तो कर ली, लेकिन किसानों को ठोस फायदा क्या मिला? उन्होंने कहा कि 350 किलोमीटर दूर नागलवाड़ी में बैठक कर सरकार ने बड़ा दावा किया, लेकिन जमीन पर क्या बदलाव होगा, यह देखना बाकी है।निमाड़ और बड़वानी क्षेत्र के किसान फसल के उचित दाम, सिंचाई सुविधा और कर्ज राहत जैसे मुद्दों को लेकर लंबे समय से मांग कर रहे हैं।
