पानी में भिगोने से भी नहीं होंगे खराब…दुनिया के इन देशों में चलते हैं प्लास्टिक के नोट, भारतीय रिजर्व बैंक भी कर रहा तैयारी
By Ashish Meena
मई 29, 2026
हमारी और आपकी जेब में रखे कागज के नोट जल्द ही इतिहास बन सकते हैं. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) तेजी से बढ़ती नकदी की मांग को पूरा करने के लिए एक बड़ा कदम उठाने की तैयारी कर रहा है. केंद्रीय बैंक अब पारंपरिक कागज की जगह प्लास्टिक (पॉलीमर) के नोट छापने की योजना पर गंभीरता से विचार कर रहा है. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो पटना और मुंबई में हुई आरबीआई की हालिया बोर्ड बैठकों में इस बदलाव पर गहन मंथन हुआ है. लेकिन क्या यह कॉन्सेप्ट नया है? बिल्कुल नहीं. दुनिया के कई देश पहले ही इस तकनीक को अपना चुके हैं. आइए समझते हैं कि आखिर प्लास्टिक के नोटों में ऐसा क्या खास है और ये किन देशों में चल रहा है.
ढाई गुना ज्यादा चलती है पॉलीमर करेंसी
कागज के नोटों को हटाने के पीछे सबसे बड़ा कारण लागत और उनका टिकाऊपन है. बैंकिंग एक्सपर्ट्स का मानना है कि प्लास्टिक के नोट आम कागज के नोटों की तुलना में करीब ढाई गुना ज्यादा चलते हैं. इन पर पानी, नमी और गंदगी का कोई खास असर नहीं होता. ये नोट जल्दी फटते नहीं हैं, जिससे इन्हें बार-बार छापने का खर्च बचता है. इसके अलावा, प्लास्टिक नोटों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इनकी नकल करना या जाली नोट बनाना लगभग नामुमकिन होता है. इन्हीं फायदों को देखते हुए दुनिया भर के केंद्रीय बैंक इस विकल्प की तरफ तेजी से शिफ्ट हो रहे हैं.
इन देशों ने पूरी तरह बदल दी अपनी करेंसी
पूरी दुनिया में करीब 60 देश प्लास्टिक के नोटों का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन दुनिया के कुछ बड़े देश ऐसे हैं जिन्होंने अपने सिस्टम से कागज के नोटों को पूरी तरह खत्म कर दिया है.
ऑस्ट्रेलिया: प्लास्टिक नोटों की शुरुआत करने वाला यह दुनिया का पहला देश है. साल 1988 में ही यहां पॉलीमर नोट चलन में आ गए थे. यह दुनिया का इकलौता देश भी है जो इन नोटों का उत्पादन करता है.
न्यूजीलैंड: साल 1999 में इस देश ने अपने सभी कागजी नोटों को चलन से बाहर कर दिया था. यहां सबसे छोटा नोट 5 डॉलर और सबसे बड़ा 100 डॉलर का होता है.
ब्रूनेई: दक्षिण-पूर्व एशिया के इस अमीर देश ने जाली नोटों के खतरे से निपटने के लिए पूरी तरह से प्लास्टिक नोटों को अपना लिया है.
वियतनाम: यहां 2003 में पॉलीमर नोटों की एंट्री हुई थी. आज वियतनामी डोंग पूरी तरह प्लास्टिक का है, जिसका सबसे बड़ा नोट 5 लाख का होता है, जो करीब 20 अमेरिकी डॉलर के बराबर है.
रोमानिया: यूरोप में रोमानिया इकलौता ऐसा देश है जिसने 2005 में ही अपने सभी नोटों को पॉलीमर में बदल दिया.
पापुआ न्यू गिनी: यहां 1975 तक ऑस्ट्रेलियन डॉलर चलता था, लेकिन इसके बाद ‘कीना’ नाम से नई मुद्रा आई. अब यहां सिर्फ प्लास्टिक नोट चलते हैं. दिलचस्प बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी-7 सम्मेलन के सिलसिले में 22 मई को पहली बार इसी देश के दौरे पर जा रहे हैं.
60 देशों में बज रहा इस नई तकनीक का डंका
वैश्विक स्तर पर पॉलीमर नोटों का चलन तेजी से बढ़ रहा है. 1988 में ऑस्ट्रेलिया के 10 डॉलर के नोट से शुरू हुआ यह सफर आज सिंगापुर, इंडोनेशिया, मलेशिया और थाईलैंड तक पहुंच चुका है. यूरोप में रोमानिया ने 1998 में इसकी शुरुआत की, तो कनाडा ने भी साल 2011 में इसे अपने सिस्टम का हिस्सा बना लिया. वहीं, अगर दुनिया की सबसे मजबूत करेंसी यानी अमेरिकी डॉलर की बात करें, तो वह पूरी तरह प्लास्टिक का नहीं होता. अमेरिकी करेंसी को कॉटन और लिनन के एक खास मिश्रण से तैयार किया जाता है.
