मालवा-निमाड़ के खिवनी अभयारण्य को टाइगर रिजर्व बनाने की मांग

By Ashish Meena
जुलाई 29, 2026

देवास और सीहोर जिलों की सीमा पर, विंध्याचल पर्वतमाला की गोद में स्थित मालवा-निमाड़ के खिवनी अभयारण्य में बाघों की संख्या लगातार बढ़ रही है। घने जंगल, पर्याप्त जलस्रोत और अनुकूल प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण यह क्षेत्र बाघों का सुरक्षित ठिकाना बन गया है। वर्तमान में यहां लगभग 10 बाघ, बाघिन और उनके शावकों की मौजूदगी दर्ज की गई है। बढ़ती संख्या को देखते हुए अब खिवनी के विस्तार और इसे टाइगर रिजर्व का दर्जा देने की मांग जोर पकड़ रही है।

लगभग 134.7 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला खिवनी अभयारण्य बाघों के अलावा तेंदुआ, भालू, भेड़िया, लोमड़ी, सांभर, चीतल और नीलगाय जैसे कई अन्य वन्यजीवों का भी घर है। यहां पर्याप्त शिकार आधार और एक मजबूत इकोसिस्टम बाघों के लिए अनुकूल आवास प्रदान करता है। यही कारण है कि खिवनी अब वन्यजीव प्रेमियों और पर्यटकों के लिए एक प्रमुख आकर्षण केंद्र बन गया है।

कई बार किया गया विस्तार

वर्ष 1955 में स्थापित खिवनी अभयारण्य का समय-समय पर विस्तार किया गया है। जंगल के भीतर बसे गांवों के विस्थापन और इको-सेंसिटिव जोन घोषित होने के बाद यहां संरक्षण गतिविधियों में तेजी आई। वर्ष 2018 से पर्यटन सुविधाओं का विकास शुरू हुआ, जिसमें टेंट कैंप, कॉटेज और जंगल सफारी जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। बाघों की बढ़ती मौजूदगी के कारण पिछले वर्ष अक्टूबर से इस वर्ष 30 जून तक 12 हजार से अधिक पर्यटक यहां आ चुके हैं।

वन विभाग ने बाघों के सुरक्षित विचरण और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अभयारण्य के विस्तार का प्रस्ताव तैयार किया है। इसके तहत वर्तमान अभयारण्य से लगे लगभग 60 वर्ग किलोमीटर सामान्य वन क्षेत्र को इसमें शामिल करने का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है। प्रस्तावित क्षेत्र में देवास जिले की कन्नौद, खातेगांव और पानीगांव रेंज के साथ सीहोर जिले की आष्टा और इछावर रेंज को जोड़ने की योजना है। इससे बाघों को एक बड़ा और सुरक्षित वन क्षेत्र उपलब्ध हो सकेगा।

रातापानी-ओंकारेश्वर कॉरिडोर की महत्वपूर्ण कड़ी

खिवनी अभयारण्य: पश्चिमी मध्यप्रदेश के महत्वपूर्ण रातापानी-खिवनी-ओंकारेश्वर (आरकेओ) टाइगर कॉरिडोर का हिस्सा है। इसी कॉरिडोर के माध्यम से बाघों का आवागमन रातापानी, ओंकारेश्वर, खंडवा और महाराष्ट्र के जंगलों तक होता है। वन्यजीव विशेषज्ञ इसे क्षेत्र की जैव विविधता और बाघ संरक्षण के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं।

युवराज और मीरा ने दिलाई नई पहचान

खिवनी की पहचान को नई ऊंचाई देने में बाघ युवराज और बाघिन मीरा की महत्वपूर्ण भूमिका रही। दोनों लंबे समय तक इस जंगल में विचरण करते रहे और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बने। हालांकि कुछ समय पहले बाघ टी-3 के साथ क्षेत्रीय संघर्ष में युवराज घायल हो गया था, जिसके बाद उसे उपचार के लिए वन विहार, भोपाल भेजा गया। वर्तमान में टी-3 ने उस क्षेत्र में अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया है।

टाइगर सोर्स के रूप में विकसित करने की तैयारी

अधीक्षक विकास माहोरे का कहना है कि खिवनी को भविष्य में बाघों के प्रमुख सोर्स पॉपुलेशन एरिया के रूप में विकसित करने की दिशा में वन विभाग काम कर रहा है। वन्यजीव संरक्षण के साथ वाइल्ड लाइफ टूरिज्म को बढ़ावा देकर आसपास के ग्रामीणों को रोजगार से जोड़ने की भी योजना है। बढ़ती बाघ आबादी इस बात का संकेत है कि कभी उपेक्षित रहा खिवनी का जंगल अब प्रदेश के महत्वपूर्ण टाइगर लैंडस्केप के रूप में उभर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते संरक्षण को और मजबूत किया गया तो यह क्षेत्र भविष्य में मध्यप्रदेश के प्रमुख टाइगर रिजर्व में शामिल हो सकता है।

आगे ये भी पढ़ें :
Ashish Meena

Ashish Meena

ashish-meena

आशीष मीणा हिंदी पत्रकार हैं और राष्ट्रीय तथा सामाजिक मुद्दों पर लिखते हैं। उन्होंने पत्रकारिता की पढ़ाई की है और वह तथ्यात्मक व निष्पक्ष रिपोर्टिंग पर ध्यान केंद्रित करते हैं।