देवास में मंत्री पद की दौड़! आशीष शर्मा की दिल्ली तक मजबूत पकड़, गायत्री राजे पवार को लंबा अनुभव, मनोज चौधरी को सिंधिया खेमे का सहारा, पांचों विधायक देने वाला जिला अब भी सत्ता में खाली हाथ
By Ashish Meena
अगस्त 6, 2026
मालवा जंक्शन, देवास।
देवास जिले की राजनीति में एक बार फिर सुगबुगाहट तेज हो गई है। मध्य प्रदेश में मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चाओं के बीच जिले के सियासी गलियारों में हलचल देखने को मिल रही है, जहाँ एक तरफ नेता अपनी दावेदारी को मजबूत करने के लिए समीकरण जोड़ने में जुटे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ सियासी मोर्चों पर अंदरखाने खींचतान और दावेदारी तोड़ने की रणनीतियाँ भी आकार ले रही हैं।
इस राजनीतिक सरगर्मी के बीच देवास की जनता और राजनीतिक विश्लेषकों के मन में एक बड़ा सवाल तैर रहा है—क्या इस बार पांचों विधानसभा सीटें जीतने वाले देवास जिले को राज्य के मंत्रिमंडल में उचित प्रतिनिधित्व मिलेगा?
Also Read – महाकाल की भस्म आरती का रहस्य, अब श्मशान की राख नहीं, इस विशेष विधि से तैयार होती है भस्म
VVIP मुलाकातों के सियासी मायने
हाल ही में देवास जिले के राजनीतिक दिग्गजों की दिल्ली और भोपाल के शीर्ष नेतृत्व के साथ हुई मुलाकातों ने हवा में कई कयासों को जन्म दे दिया है।
खातेगांव विधायक आशीष शर्मा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ नजर आए।
देवास से विधायक गायत्री राजे पवार ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मुलाकात की।
वहीं, सांसद महेंद्र सिंह सोलंकी की तस्वीर केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ सामने आई।
इन मुलाकातों को औपचारिक शिष्टाचार भले ही कहा जाए, लेकिन जब मंत्रिमंडल में नए चेहरों के शामिल होने की अटकलें तेज हों, तो इनके राजनीतिक निहितार्थ निकाले जाना स्वाभाविक है।
Also Read – देवास: चलती बाइक से गिरा युवक, अस्पताल में मौत, बहन से मुलाकात के बाद लौट रहा था
पाँचों सीटें जीतने के बावजूद जिला खाली हाथ
यह विडंबना ही है कि वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में देवास जिले की सभी पाँचों विधानसभा सीटों—देवास, सोनकच्छ, हाटपीपल्या, खातेगांव और बागली—पर भारतीय जनता पार्टी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। इसके बावजूद, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के वर्तमान मंत्रिमंडल में देवास जिले के किसी भी विधायक को स्थान नहीं मिल सका। जिस जिले ने पार्टी को शत-प्रतिशत जनादेश दिया, उसका सत्ता में प्रतिनिधित्व न होना राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना रहा है। अब संभावित विस्तार से एक बार फिर उम्मीदें जागृत हुई हैं।

1. आशीष शर्मा: लगातार तीसरी बार विधायक और मजबूत पकड़
खातेगांव कन्नोद विधानसभा क्षेत्र से आशीष गोविंद शर्मा ने 2013, 2018 और 2023 में लगातार तीसरी बार जीत दर्ज कर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत की है। वे पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के करीबी माने जाते हैं, और उनका क्षेत्र भी विदिशा लोकसभा के अंतर्गत आता है। हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से उनकी मुलाकात यह दर्शाती है कि वे अपनी दावेदारी को केवल क्षेत्रीय स्तर तक सीमित न रखकर केंद्रीय स्तर पर मजबूत करना चाहते हैं। आशीष शर्मा की पकड़ सिर्फ राज्य तक ही नहीं बल्कि केंद्र में भी मजबूत है।
Also Read – सरकार अब जिंदा रखे या मार दे…छात्रों की हुंकार, रांची का स्टेडियम बना जंतर-मंतर
2. गायत्री राजे पवार: लंबा अनुभव और तीसरी बार की जीत
गायत्री राजे पवार वर्ष 2015 के उपचुनाव, 2018 और फिर 2023 के चुनाव में विजयी होकर तीसरी बार देवास की विधायक बनी हैं। 2023 के चुनाव में उन्होंने शानदार मतों से जीत हासिल की थी। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में उन्हें प्रशासनिक और राजनीतिक रूप से बेहद प्रभावशाली माना जाता था। वे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के साथ अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ाने के प्रयासों में जुटी हैं। हालांकि, उनकी राह में सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के भीतर का शक्ति संतुलन और स्थानीय समीकरण हैं।
3. डॉ. राजेश सोनकर: सोनकच्छ से चौंकाने वाला नाम
सोनकच्छ (अजा आरक्षित) सीट से भाजपा विधायक डॉ. राजेश सोनकर ने पिछले चुनाव में कांग्रेस के दिग्गज नेता को शिकस्त दी थी। वे इससे पहले सांवेर से भी विधायक रह चुके हैं। सांगठनिक अनुभव और आरक्षित वर्ग से आने के कारण यदि पार्टी क्षेत्रीय संतुलन और जातिगत समीकरणों को साधती है, तो वे एक मजबूत और अप्रत्याशित विकल्प साबित हो सकते हैं।
4. मनोज चौधरी: सिंधिया खेमे का प्रतिनिधित्व
हाटपीपल्या से विधायक मनोज नारायण सिंह चौधरी ने लगातार तीन बार (कांग्रेस, उपचुनाव और फिर 2023 में भाजपा से) चुनावी सफलता हासिल की है। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थन को उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत माना जाता है। सिंधिया कोटे से यदि मंत्रिमंडल में जगह मिलनी हुई, तो उनका दावा भी मजबूत माना जा सकता है।
5. मुरली भंवरा: आदिवासी चेहरा और जमीनी पकड़
बागली (अजजा आरक्षित) सीट से पहली बार विधायक बने मुरली भंवरा पृष्ठभूमि से शिक्षक और संघ-संगठन से जुड़े रहे हैं। यदि नेतृत्व किसी नए, विवादरहित और जमीनी आदिवासी चेहरे को आगे बढ़ाने का निर्णय लेता है, तो उनका नाम भी दौड़ में शामिल हो सकता है।
सत्ता परिवर्तन और अंदरूनी खींचतान
पूर्ववर्ती सरकार के दौरान जिन नेताओं का प्रभाव चरम पर था, वे अब नए सत्ता समीकरणों के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहे हैं। क्या मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पुराने खेमे के नेताओं को तरजीह देंगे या किसी नए चेहरे को आगे लाएंगे, यह सबसे बड़ा असमंजस है। एक तरफ जहाँ नेता अपने संपर्कों के जरिए ‘दावेदारी जोड़ने’ में लगे हैं, वहीं दूसरी तरफ आपसी लॉबिंग के चलते एक-दूसरे की ‘दावेदारी तोड़ने’ के कयास भी कम नहीं हैं।
कुर्सी मिलने से क्या बदलेगा?
नेताओं की दौड़ और मंत्रिमंडल में जगह पाने की इस जद्दोजहद के बीच आम जनता के सरोकार अलग हैं। देवास शहर की टूटी सड़कें, जलभराव और अटकी योजनाएं, ग्रामीण इलाकों की सिंचाई और सड़क समस्याएं, तथा आदिवासी अंचल की बुनियादी जरूरतें आज भी मुंह बाए खड़ी हैं।
